काल भैरव: देश रक्षा के लिए हमारे संत समाज भी हमेशा आगे रहे है। इनमें भैरव देवता का नाम सबसे पहले आता है। वह समाज की बहनों को आक्रमणकारियों से छुड़ाकर वापस लाए थे और उनकी रक्षा की थी। आज भी बहनें भैरव देवता को पूजती है, उनको अपना आराध्य एवं रक्षक मानती है।

उत्तराखंड में भैरव बाबा की कहानी टमोटा भाइयों से शुरू होती है। तो दो भाई थे, जो तांबे का व्यापार करते थे। कुछ व्यापारिक लेन- देन के चलते नैन सिंह और गोरखा का कर्ज टमोटा भाइयों ने नहीं चुकाया था। जिसके चलते एक बार आधी रात को समुंदर पार नेपाल देश से नैन सिंह और गोरखा आकर टमोटा भाइयों के घर में घुस जाते है। दोनों भाई टमोटा उस वक्त सो रहे होते है। उनको सोता हुआ देख नैन सिंह और गोरखा मिलकर एक ऐसी विद्या का इस्तेमाल करते है, जिससे वह दोनों भाई तब तक नहीं उठ सकते जब तक वह ना चाहे। तो इस प्रकार से टमोटा भाइयों पर मंत्र लगाकर वह उनकी बहनों को उठाकर ले जाते है।

जब टमोटा भाइयों की नींद खुलती है तो वह देखते है की उनकी दोनों बहने रमौती और जमौती गायब है। वह चारों तरफ़ उनकी तलाश करते है परन्तु वह उनको कहीं भी नहीं मिलती है। रातों- रात घर से बहनों का यूँ गायब हो जाना, दोनों भाइयों को काफ़ी परेशानी में डाल देता है।

वह दोनों भाई परेशान होकर ज़ोर- ज़ोर से रोने लगते है। यह देख उनका कोई जानकार व्यक्ति उन्हें सलाह देता है की आप दोनों भाई जोशीमठ में स्थित नरसिंह देवता के स्थान पर जाए। जिसके बाद दोनों टमोटा भाई नरसिंह देवता के मठ यानी जोशीमठ के लिए निकल पड़ते है।

नरसिंह देवता के स्थान पर पहुँच दोनों भाई अपनी परेशानी बताने लगते है। दया में आकर नरसिंह देवता उनको अपने दर्शन दे देते है और उन्हें एक रास्ता बताते है। नरसिंह देवता उनसे कहते है की आप हूण देश जाएँ। जहां बंगाली गुरु लामा रहते है। नरसिंह देवता उनसे कहते है की वह बंगाली गुरु ही आपकी सहायता कर सकते है।

बड़ी मुश्किलों के बाद जैसे- तैसे करके टमोटा भाई बंगाली गुरु के पास हूण देश में पहुंच जाते है। वह लामा गुरु को अपनी परेशानी बताते है। इसके साथ ही वह गुरु को कुछ सामान, चाँदी एवं 16रु नगद देते है। टमोटा भाइयों के काफ़ी रोने व विलाप करने के बाद गुरु उनको एक लाल हांडी देते है। और कहते है की आपको हांडी सिर पर रखकर ही ले जानी होगी। क्योंकि इसे धरती व जमीन पर नहीं रख सकते। साथ ही आपको किसी गांव से ना होकर जंगल से रास्ते से जाना होगा।

यह सब के बाद, टमोटा भाई जंगल के रास्ते निकल पड़ते है। कुछ दूरी पर चलकर वह रास्ता भटक जाते है। और डोबरी गांव में पहुँच जाते है। तो उस समय गांव में पांडव यज्ञ हो रहा होता है काशीलाल पंडित जी द्वारा।

उस यज्ञ में बज रहे 22 बाजे, 36 ताल सुनकर लाल हांडी फट जाती है। जिसके अंदर से कई सारे राई के बीज, सरसों आदि निकलते है। और काल भैरव प्रकट हो जाते है। इसके बाद भैरव देवता वहीं चले जाते है जहां यज्ञ हो रहा होता है। यज्ञ में भैरवनाथ का विकराल रूप देख सब लोग डर जाते है। कोई कहता है की भूत आ गया, कोई कहता है की मसाण आ गया, कोई कहता है प्रेत आ गया, आदि।

कुछ देर बाद भैरव देवता(काल भैरव) सबको बताते है की- “मैं कोई भूत या प्रेत नहीं हूं। मैं तो वीर कालनाथ भैरव हूँ।” अपने भक्त टमोटा की बहनों को बचाने नेपाल देश जा रहा हूँ।

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इस सब के बाद, भैरवनाथ नेपाल देश के लिए निकल पड़ते है। वहां जाकर वह नैन सिंह और गोरखा से युद्ध करते है एवं टमोटा की बहनों को वापस भारत, उनके घर ले आते है।

अपनी बहनों को सही- सलामत वापिस आते देख, टमोटा भाई काफ़ी खुश हो जाते है। जिसके बाद वह खुशी से भैरव देवता का धन्यवाद करते है और उत्तराखंड में उनका मंदिर बनाते है।

तब से लेकर आज तक भैरवनाथ सभी उत्तराखंड वासियों की रक्षा करते आ रहे है। वह हमेशा अपने भक्तों को न्याय दिलाते है और सब की रक्षा करते है।

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